डॉ.गिरीश आफळे लिखित श्रीगुरू तेग बहादुरजी – हिंद की चादर पुस्तकाचे प्रकाशन

Share this News

निगडी / पुणे दि.२९ मार्च (सिटीनामा वृत्तसेवा)
सुप्रसिद्ध लेखक, सामाजिक कार्यकर्ते डॉ.गिरीश आफळे लिखित आणि भारतीय विचार साधना प्रकाशित श्रीगुरू तेग बहादुरजी – हिंद की चादर या महत्वपूर्ण पुस्तकाचे पिंपरी चिंचवड शहरातील निगडी प्राधिकरण येथील सेक्टर २७ या वस्तीतील विराट हिंदू संमेलनात डॉ. संजय उपाध्ये यांच्या हस्ते विमोचन झाले. या संमेलनात प्रमुख वक्ते म्हणून डॉ. संजय उपाध्ये तसेच देहूरोड गुरुद्वाराचे अध्यक्ष गुरुमित सिंह रत्तू, तसेच संमेलनाचे अध्यक्ष सूर्यकांत मुथियन, ह. भ. प. विनया कोल्हटकर, डॉ. माधवी महाजन, स्व. दत्तोपंत म्हसकर संस्थेचे सचिव मिलिंद कुलकर्णी, आर.सी. सी. कन्सल्टंट मोहन साखळकर हे मान्यवर प्रामुख्याने उपस्थित होते.
आपल्या भाषणात डॉ. संजय उपाध्ये म्हणाले, “असे पुस्तक नव्या पिढीने वाचणे अत्यंत आवश्यक आहे. अशा बलिदानामुळे हिंदूधर्म इतकी वर्षे टिकून राहिला आहे.”
पुस्तकाचे लेखक डॉ. गिरीश आफळे म्हणाले, “दिल्लीत त्यावेळी क्रूर आणि धर्मांध औरंगजेब बादशाह होता. त्याने काशी विश्वनाथाचे, मथुरेच्या केशव देवाचे मंदिर व इतर अनेक मंदिरे पाडली होती. हिंदूंना सक्तीने बाटवण्याचा सपाटा लावला होता. अशावेळी काश्मिरी पंडित शिखांचे नववे गुरू श्रीतेगबहादुरजी यांच्याकडे अभयदान मागण्यासाठी आले. ते आव्हान श्रीगुरुजींनी स्वीकारले आणि औरंगजेबालाच उलट आव्हान दिले की, “औरंगजेबाने प्रथम त्यांचे (गुरूंचे) धर्मांतर करून दाखवावे मगच काश्मिरी पंडित धर्मांतर करतील.” झाले. श्री गुरु तेग बहादुर जी आणि त्यांच्या तीन प्रिय शिष्यांना अटक करून त्यांचा चाळीस दिवस छळ करून मग दिल्लीत आणण्यात आले. बाटून मुसलमान व्हा अथवा मृत्यूला सामोरे जा, असे दोनच पर्याय त्यांच्यासमोर होते. बाटण्याचा पर्याय श्री गुरुजींनी नाकारला. श्रीगुरूंवर दबाव आणण्यासाठी त्यांच्या डोळ्यादेखत त्यांच्या तीन प्रिय शिष्यांना वेगवेगळ्या पण क्रूर पद्धतीने ठार मारण्यात आले. श्रीगुरुजींनीही धर्मांतरित होण्यास नकार देताच त्यांचा ११ नोव्हेंबर १६७५ या दिवशी दिल्लीच्या चांदणी चौकात शिरच्छेद करण्यात आला.

   ‘श्रीगुरू तेग बहादुरजी – हिंद की चादर’ –   या पुस्तकात खालील तीन गोष्टींवर मुख्य भर दिलेला आहे.

१) हिंदूधर्म व शीख पंथ हे वेगवेगळे नसून परस्परांमध्ये दुधात साखर मिसळावी तसे मिसळून गेले होते. कालांतराने इंग्रजांनी हिंदू व शिख हे वेगळे आहेत हा प्रचार केला आणि पुढे मार्क्सवादी इतिहासकारांनी तो प्रचार तसाच उचलून धरला.
२) बंजारा समाज आणि वाल्मिकी समाज यांचा श्रीगुरूंच्या जीवनात किती व कसा महत्त्वाचा भाग होता हे लेखकाने विस्तृतपणे सांगितले आहे.
३) औरंगजेबप्रेमी लोकांच्या डोळ्यात अंजन घालण्यासाठी हे पुस्तक फारच उपयुक्त ठरेल.
आज आपण जे काही हिंदू म्हणून शिल्लक आहोत त्याच्यासाठी आत्मबलिदान करणाऱ्यांमध्ये श्रीगुरु तेगबहादुरजी हे अग्रेसर होते. औरंगजेबाने १६८९ यावर्षी अत्यंत क्रूरपणे छळ करून छत्रपती संभाजी महाराजांनाही ठार मारले होते.
त्यामुळे नेमका याविषयी इतिहास काय सांगतो? धर्म टिकवून ठेवण्यासाठी कसे बलिदान झाले हे समजून घेण्यासाठी हे पुस्तक तरुणांसोबतच सर्वांनी अवश्य वाचले पाहिजे असे लेखक डॉ.गिरीश आफळे सिटीनामा NEWS सोबत बोलतांना म्हणाले.

One thought on “डॉ.गिरीश आफळे लिखित श्रीगुरू तेग बहादुरजी – हिंद की चादर पुस्तकाचे प्रकाशन

  1. “प्रगट भये गुरु तेग बहादुर। सगल सृष्ट पै ढापी चादर।”

    गुरु गोबिंद सिंह जी के 52 दरबारी कवियों में से एक, कवि ‘सैनापति’ उर्फ ‘सैना सिंह’ अपनी रचना ‘गुरु सोभा’ में गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के बारे में लिखते हैं:-

    “प्रगट भये गुरु तेग बहादुर। सगल सृष्टि पे ढापी चादर।”

    ब्राह्मण प्रधान हिंदू मानसिकता वाले लेखकों ने ‘सृष्ट दी चादर’ को ‘हिंद दी चादर’ में बदल दिया।

    ‘हिन्द दी चादर’ का प्रचार करके गुरु साहिब जी की महान और लौकिक और अलौकिक सोच को ‘हिन्दू’, ‘हिन्दी’, ‘हिन्दुस्तान’ के दायरे में क़ैद कर दिया गया। जो लोग इस ब्राह्मणवादी मानसिकता के शिकार हैं वे अक्सर पूछते हैं:

    “क्या गुरु साहिब जी की शहादत को सृष्टि से जोड़कर देखा जा सकता है?”

    बिल्कुल! सिक्ख धर्म कर्मकांड, पाखंड, अवतारवाद, बहुदेववाद, मूर्तिपूजा, भ्रम, अंधविश्वास, जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच, जाति-पाँति का विभाजन, पितृसत्तात्मक समाज, सती प्रथा, पर्दा प्रथा आदि सामाजिक बुराइयों का कड़ा विरोध करता है।

    गुरबाणी का मूल सिद्धांत भी त्रिदेवी ‘ॐ’ के सिद्धांत का भी विस्तृत विरोधी है।

    गुरु साहिब जी भक्त कबीर जी की विचारधारा का सम्मान करते थे, जिसमें उन्होंने ब्राह्मणवादी विचारधारा का विरोध करते हुए लिखा था:

    “ओए हरि के संत न आखीऐ, बानारस के ठग..” (राग आसा भगत कबीर जी – पृष्ठ संख्या 476)

    गुरु नानक साहिब जी ‘आसा की वार’ में ‘ब्राह्मणवादी विचारधारा’ का पालन करने वालों को ‘जगत कसाई’ कहते हैं।

    इतने सैद्धांतिक विरोध के बाद भी, गुरु तेग बहादुर जी ने अपने ‘सैद्धांतिक विरोधियों’ के ‘मानवाधिकारों’ के लिए अपनी शहादत दे दी, जो अपने आप में दुनिया के सामने एक अद्वितीय और अनूठा उदाहरण है। यह बात अलग है कि आज के ब्राह्मण-प्रधान मानसिकता वाले हिंदू लेखक इस शहादत को बलिदान या बलि (पशुओं की बलि) से ज़्यादा महत्व नहीं देते। वे इस शहादत को हिंदुओं, हिंदी और हिंदुस्तान के दायरे तक ही सीमित रखना चाहते हैं। वे इस शहादत को मुस्लिमों के विरुद्ध और हिंदू धर्म के सेवक व प्रहरी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

    अपने वैचारिक विरोधियों और मानवाधिकारों के लिए गुरु तेग बहादुर साहिब जी की अद्वितीय, अविश्वसनीय और अकल्पनीय शहादत, ब्राह्मण-प्रधान हिंदू समाज के लिए दिए गए बलिदान का प्रचार करके, वे अपनी संकुचित सोच, कृतघ्नता, उपकार-भ्रम, बेईमानी और चतुराई को दुनिया के सामने उजागर करते हैं।

    प्रश्न उठता है कि गुरु तेग बहादुर जी की शहादत हिंदू धर्म के लिए तो स्थापित है, लेकिन क्या इसे अन्य धर्मों, विशेषकर मुस्लिम धर्म की रक्षा से भी जोड़ा जा सकता है?

    हाँ! इतिहास गवाह है, ब्राह्मणवादी विचार और व्यवस्था ने बौद्ध, जैन और नंदवंश के साम्राज्य में घुसपैठ करके उसे नष्ट कर दिया।

    मनुवादी अपने विरोधियों के धर्म में घुसपैठ करके उसे नष्ट करने की नीति में माहिर हैं। औरंगज़ेब स्वयं उन्हें अपने धर्म में परिवर्तित कर रहा था। चतुर और चालाक मनुवादी/ब्राह्मणवादी गुरु तेग बहादुर जी के पास आकर शिक़ायत करते थे। यदि गुरु साहिब ने उनकी रक्षा न की होती, तो सिक्खों के लिए एक सैद्धांतिक संकट उत्पन्न हो जाता, क्योंकि ‘शरणार्थियों की रक्षा’ का अर्थ है “जो कोई शरण लेगा, उसे कण्ठ से लगाया जाएगा, यह मेरे प्यारे प्रभु का स्वतः स्फूर्त स्वभाव है।” (राग बिहागड़ा महला 5वां – पृष्ठ संख्या 544) एक सिक्ख सिद्धांत है। दूसरी ओर, इस नीति से मनुवादियों/ब्राह्मणवादियों ने अपने दो सैद्धांतिक विरोधियों (सिक्ख और मुस्लिम) को आपस में लड़वाया।

    यदि गुरु साहिब ने उनके लिए अपनी शहादत न दी होती, तो सिक्ख सिद्धांत टूट जाता, और ब्राह्मण, मुस्लिम धर्म अपनाकर, अपनी दूसरी रणनीति के अनुसार कार्य करते, जिसमें बौद्ध धर्म की तरह शत्रु धर्म को अपनाकर नष्ट कर दिया जाता है।

    गुरु साहिब की शहादत एक ओर जहाँ अपने सैद्धांतिक विरोधियों के मानवाधिकारों की रक्षा की प्रेरणा देती है, वहीं दूसरी ओर विरोधियों का धर्म अपनाकर बौद्ध धर्म की तरह उनका विनाश करने की ‘चाणक्य नीति’ से ‘मुस्लिम धर्म की रक्षा’ भी करती है।

    गुरु जी की अद्वितीय, अनुपम शहादत को सही अर्थ, संदर्भ और शब्दों में समझकर विश्व में स्थापित करने की आवश्यकता है, जिसमें सिक्ख पंथ लगभग विफल हो गया था।

    इस शहादत ने न केवल तीन राष्ट्रों के अस्तित्व की रक्षा की, बल्कि शेष विश्व के लिए अपने विरोधियों के मानवाधिकारों की रक्षा करने वालों के लिए भी एक प्रकाश स्तंभ बनी रहेगी।

    इस महान शहादत से तीन तत्व उभरते हैं:-

    1. शरणार्थियों की रक्षा करके ‘सिक्ख सिद्धांत’ की रक्षा की।

    2. विश्व को ‘नई दिशा’ प्रदान करके अपने ‘विरोधियों’ के ‘मानवाधिकारों’ की रक्षा की और ब्राह्मणों की भी रक्षा की।

    3. ‘अपना धर्म अपनाकर अपने विरोधियों का सफाया करने’ की ‘चाणक्य नीति’ से ‘मुस्लिम समाज’ की रक्षा की। मुस्लिम समाज को भी इस शहादत का महत्व समझना चाहिए।

    आइए अब देखें कि क्या ‘गुरु शोभा ग्रन्थ’ के रचयिता कवि सेनापति उर्फ़ सैना सिंह की क़लम सही साबित हुई है, जिसे इस प्रकार स्वीकार किया जा सकता है:-

    “प्रगट भये गुरु तेग बहादुर। सगल सृष्ट पै ढापी चादर।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *